प्रदेश को बंधुआ श्रम से पूरी तरह मुक्त करने के प्रयास तेज किए जा रहे हैं और इसका असर भी दिखने लगा है। श्रमिकों को बंधन से मुक्त कराकर उन्हें आर्थिक सहायता के जरिये पुनर्वास से जोड़ा जा रहा है, लेकिन इसकी रफ्तार अभी धीमी है। पिछले वर्ष प्रदेश में 165 बंधुआ श्रमिकों की पहचान की गई। इनमें से 87 श्रमिकों का ही पुनर्वास हो सका है।
बंधुआ श्रमिकों के पुनर्वास के लिए राज्य सरकार हर वर्ष अपने बजट में 25 करोड़ रुपये का प्रविधान करती है, जिसकी प्रतिपूर्ति बाद में भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय से की जाती है। योजना के तहत श्रमिकों को तीन श्रेणियों में आर्थिक सहायता दी जाती है।
पुरुष श्रमिकों को एक लाख
पहली श्रेणी में पुरुष श्रमिकों को एक लाख रुपये दिए जाते हैं। दूसरी श्रेणी में बच्चों, अनाथों, जबरन भीख मंगवाने या अन्य प्रकार के शोषण से मुक्त कराए गए श्रमिकों और महिलाओं को दो लाख रुपये मिलते हैं।
तीसरी श्रेणी में यौन शोषण, तस्करी, वेश्यावृत्ति या गंभीर उत्पीड़न के शिकार बच्चों, महिलाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तीन लाख रुपये तक की सहायता प्रदान की जाती है। पुनर्वास प्रक्रिया की निगरानी के लिए प्रदेश में मजबूत ढांचा भी तैयार किया गया है।
सभी 75 जिलों में जिला स्तरीय सतर्कता समितियां गठित हैं, जो ऐसे मामलों की निगरानी करती हैं और समय-समय पर उनका पुनर्गठन भी किया जाता है, ताकि व्यवस्था सक्रिय बनी रहे। श्रम विभाग पुनर्वासन प्रक्रिया को और तेज व प्रभावी बनाकर प्रदेश को इस कुप्रथा से मुक्त कराने का प्रयास कर रहा है।










