इतिहास गवाह है कि जब भी किसी महाशक्ति ने स्वयं को लोकतंत्र का रक्षक घोषित किया है तब-तब उसके हस्तक्षेप ने अनेक देशों की संप्रभुता को गहरी चोट पहुंचाई है. हाल ही में अमेरिका के कदम को सबने देखा है. यह हमला भी इसी मानसिकता का विस्तार है जहां राजनीतिक हितों, तेल संसाधनों और भू-रणनीतिक वर्चस्व को मानवाधिकारों और लोकतंत्र की रक्षा की आड़ में छुपाने का प्रयास किया गया है. ये हमला न सिर्फ़ अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों की अवहेलना है बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था पर भी प्रश्न लगाता है जो समानता और न्याय की बात तो करती है लेकिन शक्तिशाली देशों को मनमानी की खुली छूट दे रहा है.क्या तमाम नियमों से ऊपर है अमेरिका?वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो की गिरफ़्तारी अमेरिका की मनमानी है. विश्व के लिए अमेरिका का ऐलान है कि जब बात अमेरिका की आएगी तो सारे क़ानून, नियम और मानवाधिकारों की दुहाई ताक पर रख दी जाएगी. अमेरिका एक देश के राष्ट्रपति को मिनटों के सैन्य ऑपरेशन में उठाकर ले आता है, वेनेजुएला पर अमेरिका के इस आक्रमण के बाद संयुक्त राष्ट्र की बैठक हुई. महासचिव ने बयान दिया कि हालत चिंताजनक है और इसका पूरे क्षेत्र पर गंभीर असर पड़ेगा. महासचिव ने इस बात पर भी ज़ोर देकर कहा है कि अंतरराष्ट्रीय क़ानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का पालन करना सभी देशों के लिए महत्वपूर्ण है. ये चिंताजनक है कि अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का पालन नहीं किया है. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि रूस और चीन को नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाला, अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों को मानने की नसीहत देने वाला अमेरिका क्या संयुक्त राष्ट्र की बात मानेगा? बड़ा सवाल यह भी है कि संयुक्त राष्ट्र के नियम-क़ानून क्या सिर्फ़ कमज़ोर देशों के लिए हैं?
