विचार: मजबूत होती भारत की प्रशांत कूटनीति

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इंडोनेशिया के साथ आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं नए सिरे से गठित हो रही हैं, तकनीकी प्रतिस्पर्धा लगातार तेज हो रही है, ऊर्जा व्यवस्था एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रही है और समुद्री सुरक्षा पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। आज भारत ऐसे भरोसेमंद साझेदारों की तलाश में है, जो उसकी आर्थिक प्रगति, तकनीकी क्षमता और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने में सहयोगी बन सकें, लेकिन रणनीतिक स्वायत्तता पर कोई प्रभाव न पड़े। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड इस दृष्टि से भारत के स्वाभाविक साझेदार हैं। दोनों लोकतांत्रिक देश हैं, समुद्री शक्ति रखते हैं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिर, खुली तथा नियम-आधारित व्यवस्था के समर्थक हैं।

पिछले एक दशक में आस्ट्रेलिया भारत के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारों में शामिल हो चुका है। क्वाड के माध्यम से दोनों देशों के बीच सहयोग लगातार गहरा हुआ है और रक्षा, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी तथा आपूर्ति शृंखलाओं जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर दोनों देशों के सोच में भी व्यापक समानता दिखाई देती है। प्रधानमंत्री मोदी की आस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को और व्यापक बनाने पर जोर रहने की संभावना है। समुद्री क्षेत्र की निगरानी क्षमता बढ़ाने, नौसेनाओं के बीच तालमेल मजबूत करने, संयुक्त गश्त, रक्षा उद्योगों के बीच सहयोग तथा सैन्य क्षमता निर्माण जैसे विषय भी चर्चा के केंद्र में रह सकते हैं।

आस्ट्रेलिया के पास लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ खनिजों के विशाल भंडार हैं, जिनकी आवश्यकता इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरी निर्माण, सेमीकंडक्टर उद्योग और नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के लिए अनिवार्य है। भारत यदि हरित ऊर्जा, उन्नत विनिर्माण और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना चाहता है तो इन संसाधनों तक दीर्घकालिक और भरोसेमंद पहुंच सुनिश्चित करना उसकी रणनीतिक आवश्यकता है।

नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए यूरेनियम आपूर्ति, हरित हाइड्रोजन और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग भी दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा दे सकता है। दोनों देशों के बीच वार्षिक व्यापार 25 अरब डालर से अधिक हो चुका है। भारत-आस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौते ने व्यापार को नई गति दी है, जबकि अवसंरचना, खनन, शिक्षा, वित्तीय सेवाओं और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों में आस्ट्रेलियाई निवेश लगातार बढ़ रहा है। अब आवश्यकता व्यापक आर्थिक साझेदारी के माध्यम से निवेश और व्यापार के लिए और अधिक अनुकूल वातावरण तैयार किए जाने की है।

यदि आस्ट्रेलिया भारत की हिंद-प्रशांत रणनीति का सुरक्षा स्तंभ है तो न्यूजीलैंड आर्थिक और तकनीकी सहयोग का नया द्वार खोल सकता है। हाल में संपन्न भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते ने दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई दिशा दी है। फिलहाल द्विपक्षीय व्यापार लगभग 2.4 अरब डालर है, जो दोनों अर्थव्यवस्थाओं की क्षमता की तुलना में काफी कम है। भारत विशाल उपभोक्ता बाजार और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, जबकि न्यूजीलैंड कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, वानिकी, जैव प्रौद्योगिकी, शिक्षा और अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में विशिष्ट विशेषज्ञता रखता है।

जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा जैसी चुनौतियों के बीच न्यूजीलैंड का अनुभव भारत की कृषि को अधिक उत्पादक, टिकाऊ और आधुनिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उच्च शिक्षा और अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग भविष्य की साझेदारी को और मजबूत करेगा। द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते के अंतर्गत न्यूजीलैंड ने अगले 15 वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था में 20 अरब डालर के निवेश का संकल्प भी व्यक्त किया है। भारत के आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ संबंधों की एक ताकत दोनों देशों में बसे भारतीय मूल के लोग हैं। आस्ट्रेलिया में लगभग दस लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं, जबकि न्यूजीलैंड में भी भारतीय समुदाय तेजी से प्रभावशाली होता जा रहा है।

व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान और सार्वजनिक जीवन में उनका योगदान दोनों देशों के बीच एक मजबूत मानवीय सेतु बन चुका है। पर्यटन और शिक्षा के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच सहयोग की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। नेताओं के बीच व्यक्तिगत विश्वास भी द्विपक्षीय संबंधों को नई गति देता है। प्रधानमंत्री मोदी और आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज के बीच विकसित हुई समझ ने दोनों देशों की साझेदारी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। वहीं न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन के साथ होने वाली वार्ता दोनों देशों के संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत कर सकती है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र आने वाले दशकों में वैश्विक शक्ति संतुलन का केंद्र रहेगा। ऐसे में आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ मजबूत होते संबंध भारत को केवल इस क्षेत्र में प्रभावशाली उपस्थिति ही नहीं देंगे, बल्कि उसे एक अधिक सुरक्षित, समृद्ध और आत्मविश्वासी वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here