अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के साथ उनकी गर्मजोशी भरी मुलाकात ने दुनिया की राजनीति में नई चर्चा शुरू कर दी है।
पिछले कई महीनों से अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ, टेक्नोलॉजी और रणनीतिक मुद्दों को लेकर तनाव चल रहा था, लेकिन बीजिंग में दोनों नेताओं के बदले हुए तेवर यह संकेत दे रहे हैं कि दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतें रिश्तों को स्थिर करने की कोशिश कर रही हैं।
ट्रंप ने शी चिनफिंग को ‘महान नेता’ और ‘दोस्त’ बताया। वहीं चीन ने भी उनका भव्य स्वागत किया। ऐसे समय में भारत की स्थिति बेहद अहम हो जाती है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में नई दिल्ली ने अमेरिका और चीन दोनों के साथ संतुलित संबंध बनाने की नीति अपनाई है।
भारत एक तरफ अमेरिका के साथ रक्षा, व्यापार और इंडो-पैसिफिक रणनीति में सहयोग बढ़ा रहा है, तो दूसरी ओर चीन के साथ सीमा तनाव कम करने और आर्थिक संबंध सुधारने की दिशा में भी कदम उठा रहा है। लेकिन अगर अमेरिका और चीन के रिश्ते बहुत ज्यादा बेहतर हो जाते हैं, तो भारत की रणनीतिक अहमियत प्रभावित हो सकती है।
भारत की खास रणनीतिक स्थिति
भारत इस समय दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच संतुलन बनाकर चल रहा है। हाल के महीनों में भारत और चीन के रिश्तों में कुछ नरमी दिखाई दी है। भारत ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सोलर सेक्टर में कुछ चीनी निवेशों पर लगी पाबंदियों में ढील दी है। साथ ही दोनों देश सीमा विवाद को स्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं।
दूसरी तरफ भारत और अमेरिका के आर्थिक संबंध लगातार मजबूत बने हुए हैं। वर्ष 2025-26 में भारत का अमेरिका को निर्यात बढ़कर 87.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि अमेरिका से आयात 52.9 अरब डॉलर रहा। अमेरिका अभी भी भारत का सबसे बड़ा पश्चिमी आर्थिक साझेदार है।
इसी संतुलन की वजह से भारत ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति अपनाने में सफल रहा है। यानी भारत किसी एक गुट में पूरी तरह शामिल हुए बिना दोनों शक्तियों के साथ अपने हितों के हिसाब से संबंध बनाए रख रहा है।
अमेरिका-चीन की नजदीकी भारत के लिए चिंता क्यों?
भारत की रणनीतिक अहमियत तब ज्यादा बढ़ती है जब अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा तेज होती है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका ने भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के मुकाबले एक संतुलन बनाने वाली ताकत के रूप में देखा। इसी सोच के कारण क्वाड समूह को फिर से सक्रिय किया गया। क्वाड में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इसका उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करना माना जाता है।
लेकिन अगर अमेरिका और चीन अपने रिश्तों को स्थिर कर लेते हैं, तो अमेरिका के लिए भारत की रणनीतिक जरूरत कम हो सकती है। इससे भारत को मिलने वाला राजनीतिक और आर्थिक महत्व प्रभावित हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर चीन पर लगे टैरिफ कम हो गए और सप्लाई चेन फिर से सामान्य हो गई, तो वैश्विक निवेशक भारत के बजाय चीन की मजबूत मैन्युफैक्चरिंग व्यवस्था को ज्यादा प्राथमिकता दे सकते हैं।
सेमीकंडक्टर सेक्टर में बढ़ सकती है चुनौती
भारत इस समय खुद को इलेक्ट्रॉनिक्स और चिप मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा केंद्र बनाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन अमेरिका द्वारा चीन को इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन (EDA) सॉफ्टवेयर के निर्यात पर लगी कुछ पाबंदियां हटाने से चीन का सेमीकंडक्टर सेक्टर और मजबूत हो सकता है।
इससे भारत की प्रतिस्पर्धा और कठिन हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को तेजी से अपनी घरेलू चिप डिजाइन और टेक्नोलॉजी क्षमता बढ़ानी होगी।
क्वाड को लेकर भी बढ़ी चिंता
डोनल्ड ट्रंप की विदेश नीति को अक्सर अप्रत्याशित माना जाता है। अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने क्वाड को चीन के खिलाफ मजबूत मंच के रूप में आगे बढ़ाया था। लेकिन दूसरे कार्यकाल में क्वाड की गतिविधियां अपेक्षाकृत धीमी दिखाई दे रही हैं।
हाल के अमेरिकी रणनीतिक दस्तावेजों में भी क्वाड का जिक्र कम हुआ है। 2021 से 2024 के बीच समुद्री सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर और नई तकनीकों को लेकर कई बड़े वादे किए गए थे, लेकिन जमीन पर बहुत ज्यादा प्रगति नहीं दिखी।
भारत के लिए यह चिंता का विषय है क्योंकि क्वाड केवल एक कूटनीतिक मंच नहीं, बल्कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के प्रभाव को संतुलित करने का माध्यम भी माना जाता है।
चीन-पाकिस्तान संबंध भी बड़ी चुनौती
हालांकि भारत और चीन के रिश्तों में सुधार के संकेत मिल रहे हैं, लेकिन कई मूलभूत विवाद अभी भी बने हुए हैं। हाल ही में भारत ने चीन की आलोचना की थी क्योंकि बीजिंग ने पाकिस्तान से जुड़े आतंकी ढांचे पर कार्रवाई को लेकर भारत की चिंताओं का समर्थन नहीं किया।
इससे साफ है कि चीन आर्थिक रूप से भारत के साथ संबंध बेहतर कर सकता है, लेकिन रणनीतिक स्तर पर पाकिस्तान का समर्थन जारी रख सकता है। अगर अमेरिका और चीन के रिश्ते और बेहतर होते हैं, तो कुछ संवेदनशील सुरक्षा मुद्दों पर भारत खुद को अधिक अकेला महसूस कर सकता है।
ताइवान क्यों है भारत के लिए अहम?
बीजिंग में ट्रंप और शी की मुलाकात के दौरान ताइवान मुद्दा भी चर्चा में रहा। शी चिनफिंग ने चेतावनी दी कि अगर ताइवान के मुद्दे को गलत तरीके से संभाला गया, तो अमेरिका और चीन के बीच टकराव हो सकता है। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान खुद को अलग प्रशासन वाला लोकतांत्रिक क्षेत्र मानता है।
भारत के लिए ताइवान केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। ताइवान दुनिया के सबसे बड़े सेमीकंडक्टर और टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन केंद्रों में शामिल है।
अगर चीन और अमेरिका के बीच ताइवान को लेकर संघर्ष होता है, तो एशिया की व्यापार व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स के अनुसार, ताइवान को लेकर युद्ध होने पर दुनिया को करीब 10 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है।
भारत के लिए सबसे बेहतर स्थिति क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए सबसे बेहतर स्थिति यह नहीं है कि अमेरिका और चीन पूरी तरह दुश्मन बने रहें, लेकिन यह भी नहीं कि दोनों बहुत करीबी साझेदार बन जाएं। भारत को सबसे ज्यादा फायदा उस स्थिति में मिलता है जब अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा भी रहे और सीमित सहयोग भी चलता रहे।
ऐसे माहौल में भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रख सकता है। वह अमेरिका के साथ रक्षा और इंडो-पैसिफिक सहयोग जारी रख सकता है, जबकि चीन के साथ ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों पर काम भी कर सकता है।
आगे भारत क्या कर सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत को अपने कूटनीतिक विकल्प और बढ़ाने होंगे। भारत को यूरोपीय संघ के साथ संबंध मजबूत करने, आसियान देशों के साथ सहयोग बढ़ाने, और इंडो-पैसिफिक के मध्यम शक्तिशाली देशों के साथ साझेदारी गहरी करने की जरूरत होगी।
भारत के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती केवल चीन या अमेरिका से रिश्ते संभालने की नहीं है, बल्कि ऐसे विश्व के लिए तैयार रहने की है जहां अमेरिका और चीन एक-दूसरे को भारत से ज्यादा अहम मानने लगें।
