सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि आरटीआइ एक्टिविज्म एक नया धंधा बन गया है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने सड़क निर्माण कर रहे सरकारी कर्मचारियों के काम में बाधा डालने के आरोपित एक एक्टिविस्ट और अन्य को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया।
जस्टिस संदीप मेहता और विजय बिश्नोई की पीठ ने आरटीआइ एक्टिविस्ट राकेश कुमार बहल और उनके सहयोगी की याचिका खारिज करते हुए सड़क निर्माण कार्य की निगरानी करने के उनके अधिकार पर सवाल उठाए।
‘RTI एक्टिविज्म एक नया धंधा’
जस्टिस मेहता ने कहा, ‘आरटीआइ एक्टिविज्म एक नया धंधा बन गया है। केंद्र सरकार ने फंड जारी किया है, वही सड़क निर्माण का काम देखेगी। आप कोई नहीं हैं। तथाकथित आरटीआइ एक्टिविस्ट! याचिका खारिज की जाती है।’
जस्टिस मेहता के विचारों से सहमति जताते हुए जस्टिस बिश्नोई ने कहा, ‘इन सभी सड़कों के निर्माण की निगरानी करने वाले आप कौन होते हैं? आप कोई उच्च अधिकारी हैं या क्या?’
बहल ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। उनके वकील ने तर्क दिया कि उन्हें इस मामले में झूठा फंसाया गया है, क्योंकि उन्होंने सड़क निर्माण कार्य में भ्रष्टाचार को उजागर किया था।
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने 14 मई को अपने आदेश में कहा था कि एफआइआर में लगाए गए आरोपों से सरकारी काम में बाधा डालने में उनकी स्पष्ट भूमिका का पता चलता है। इसलिए उन्हें अग्रिम जमानत देने से इनकार किया जाता है।
यह है मामला
एफआइआर के अनुसार, राकेश कुमार बहल ने एक अन्य आरोपित राजीव कुमार उर्फ मिंटू के साथ मिलकर पंजाब के गुरदासपुर जिले के बटाला में चल रहे सड़क निर्माण कार्य में बाधा डाली और उस व्यक्ति को धमकाया, जिसकी देखरेख में काम हो रहा था।
साथ ही निर्माण स्थल पर मौजूद मजदूरों को भी धमकाया। उन्होंने मजदूरों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां की और शिकायतकर्ता को चोट पहुंचाई। उनके खिलाफ बीएनएस और एससी/एसटी एक्ट के तहत एफआइआर दर्ज की गई।
