2024 के लोकसभा चुनाव में देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों ने सभी को चौंका दिया। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि चौंकाने वाले उन नतीजों के पीछे प्रदेश के दो लड़के, कांग्रेस सांसद राहुल गांधी और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की जोड़ी का बड़ा हाथ था।
तभी तो यूपी के इन दो लड़कों के साथ आने के बाद INDIA ब्लॉक के इस गठबंधन ने राज्य की 80 में से 43 लोकसभा सीटों पर परचम लहराकर भारतीय जनता पार्टी के एक दशक पुराने दबदबे को करारा झटका दिया।
अब फिर साथ आने के मायने क्या?
हालांकि वो समय 2024 का था और नतीजे लोकसभा चुनाव के। खैर, अब समय 2026 का है और सभी की नजरे अगले साल यानी 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर हैं।
सवाल जवाब और सीट बंटवारे को लेकर बड़े दिल की बात इसलिए भी हो रही है, क्योंकि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और समाजवादी पार्टी एक बार फिर साथ दिख रहे हैं, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि असली चुनावी लड़ाई शुरू होने से पहले सीट-बंटवारे की खींचतान में ‘बड़ा दिल’ कौन दिखाएगा?
‘बड़े दिल’ की मांग और बयानों की तल्खी
अच्छा इस पूरे खींचतान की शुरुआत 2024 चुनाव के बाद हुई एक बैठक से मानी जा सकती है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने कांग्रेस को सलाह दी थी कि क्षेत्रीय दलों के दबदबे वाले राज्यों में राष्ट्रीय पार्टी को बड़ा दिल दिखाना चाहिए और लचीला रुख अपनाना चाहिए।”
जवाब में राहुल गांधी ने भी साफ किया था कि उनका मकसद सहयोगियों से लड़ना नहीं, बल्कि साथ मिलकर काम करना है। लेकिन जमीनी स्तर पर यूपी कांग्रेस के कई स्थानीय नेता इससे अलग रुख अपना रहे हैं।
कांग्रेस के दावे क्या, सपा का रुख भी साफ
राजनीति ऊहापोह और सवाल जवाब के बीच अब कांग्रेस का दावा सामने आया। कांग्रेस के प्रदेश स्तर के नेता अब ‘समानता और सम्मान’ के आधार पर 50-50 फीसदी सीटों की हिस्सेदारी की मांग उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि 2024 में सपा को जो बड़ी बढ़त मिली, उसमें कांग्रेस के राष्ट्रीय जनाधार और राहुल गांधी की छवि का अहम योगदान था।
हालांकि समाजवादी पार्टी का मानना है कि चूंकि वे राज्य में मुख्य विपक्षी दल हैं और 2027 में सरकार बनाने की मुख्य दावेदार हैं, इसलिए ज्यादा सीटों पर उनका लड़ना ही व्यावहारिक होगा।
सीटों के पुराने अनुभव, जब बिगड़ गई थी बात
इस बात को ऐसे समझिए कि कांग्रेस और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों के बीच सीट-बंटवारे को लेकर तालमेल की कमी कोई नई बात नहीं है। हाल के दिनों में कई राज्यों में इसके नकारात्मक परिणाम देखे गए हैं।
हरियाणा, बिहार और मध्य प्रदेश में गठबंधन बेनतीजा
उदाहरण के तौर पर हरियाणा में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की बातचीत बेनतीजा रही। अलग-अलग चुनाव लड़ने से विपक्षी वोट बंट गए और भाजपा तीसरी बार सरकार बनाने में सफल रही। इसके बाद बिहार में राजद और कांग्रेस के बीच सहमति बनने में हुई देरी ने ‘महागठबंधन’ की चुनावी तैयारियों को प्रभावित किया।
इसके अलावा मध्य प्रदेश भी कुछ ऐसा ही हाल रहा। पिछले विधानसभा चुनाव में कमलनाथ और अखिलेश यादव के बीच हुई जुबानी जंग ने गठबंधन की संभावनाओं को बड़ा झटका दिया था, जिसे बाद में केंद्रीय नेतृत्व के दखल से संभाला गया।
