उत्तराखंड के एक सुनसान गांव में रह रहे बुजुर्ग दंपति की यह कहानी पलायन, अकेलेपन और रिश्तों के दर्द को बेहद मार्मिक तरीके से दिखाती है. सच्ची घटना से प्रेरित फिल्म ‘पायरे’ बताती है कि बुढ़ापे में अपनों का साथ छूट जाने का दर्द कितना गहरा हो सकता है.आसमान और ठंडी हवाएं… उत्तराखंड का नाम सुनते ही मन में ऐसी ही तस्वीर उभरती है. शहरों की भागदौड़ से दूर पहाड़ों में कुछ दिन बिताना भले ही सुकून का एहसास कराता हो, लेकिन वहां रहने वाले लोगों की जिंदगी इतनी आसान नहीं होती. सड़क, अस्पताल, बिजली और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की कमी पहाड़ी इलाकों में रहने वालों के लिए बड़ी परेशानी है. पलायन के कारण कई गांव धीरे-धीरे खाली हो रहे हैं. इसी दर्द, अकेलेपन और रिश्तों की गहराई को दिखाती है फिल्म ‘पायरे’ (Pyre), जिसने अपनी सादगी और भावुक कहानी से दुनियाभर के दर्शकों का दिल जीत लिया है.क्या है ‘पायरे’ की कहानी? ‘पायरे’ का मतलब चिता होता है. फिल्म की कहानी उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के एक दूरदराज गांव में रहने वाले 80 साल के पदम सिंह और उनकी पत्नी तुलसी के इर्द-गिर्द घूमती है. गांव में न सड़क है, न अस्पताल और न ही बिजली की पर्याप्त सुविधा. पलायन के चलते ज्यादातर लोग यहां से जा चुके हैं. बुजुर्ग दंपति के अलावा गांव में महज सात लोग बचे हैं.
