मेरिका और ईरान के बीच साढ़े तीन महीने तक चले संघर्ष का सबसे बड़ा राजनीतिक नुकसान इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को उठाना पड़ता दिख रहा है।
ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाकर क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बदलने की उनकी रणनीति अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के साथ टकराव की वजह बन गई है।
ट्रंप के निशाने पर नेतन्याहू
सूत्रों के मुताबिक, युद्ध के दौरान नेतन्याहू को कम से कम पांच बार ट्रंप की नाराजगी का सामना करना पड़ा। जून की शुरुआत में ट्रंप ने कथित तौर पर एक फोन कॉल में नेतन्याहू को बेरूत पर हमला न करने की चेतावनी दी थी, क्योंकि उस समय अमेरिका ईरान के साथ समझौते की दिशा में आगे बढ़ रहा था।
हालांकि बाद में इजरायल ने लेबनान में फिर कार्रवाई की, जिससे तनाव और बढ़ गया। रविवार को अमेरिका और ईरान के बीच अंतरिम समझौते की घोषणा से कुछ घंटे पहले भी इजरायल ने बेरूत पर हमला किया। ट्रंप ने इसे अनावश्यक कदम बताते हुए नाराजगी जताई।
इजरायली अधिकारियों का मानना है कि प्रस्तावित समझौता उनके सुरक्षा हितों को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं करता।
ईरान-अमेरिका में समझौता
समझौते के तहत 60 दिनों के युद्धविराम और आगे की वार्ता का रास्ता खुला है, लेकिन इजरायल को आशंका है कि इस अवधि में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल क्षमता और क्षेत्रीय समर्थक समूहों से जुड़े उसके प्रमुख सुरक्षा मुद्दे अनसुलझे रह सकते हैं।
उधर, नेतन्याहू को घरेलू स्तर पर भी दबाव झेलना पड़ रहा है। हालिया जनमत सर्वेक्षणों में उनकी लोकप्रियता कमजोर पड़ती दिख रही है और आगामी चुनावों में उन्हें कड़ी चुनौती मिलने के संकेत हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका-ईरान समझौते ने उस राजनीतिक तर्क को भी कमजोर किया है, जिसके तहत नेतन्याहू खुद को ट्रंप का सबसे भरोसेमंद सहयोगी बताकर जनता का समर्थन हासिल करते रहे हैं।
हालांकि इजरायल ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अमेरिका-ईरान समझौते से बाध्य नहीं है। रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने कहा है कि लेबनान, सीरिया और गाजा में सुरक्षा क्षेत्रों में तैनात इजरायली सेना फिलहाल बनी रहेगी और यदि ईरान या उसके समर्थित समूहों से खतरा उत्पन्न हुआ तो उसका जवाब पूरी ताकत से दिया जाएगा।










