इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश पारित करते हुए स्पष्ट किया है कि माता-पिता के बीच चल रहे वैवाहिक या आपराधिक विवाद किसी नाबालिग को पासपोर्ट जारी करने से इनकार करने का वैध कानूनी आधार नहीं हो सकते. जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने ‘पोयम जैसवार’ नामक दो वर्षीय नाबालिग की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की. कोर्ट ने जोर देकर कहा कि पासपोर्ट प्राप्त करना और विदेश यात्रा करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ के मौलिक अधिकार का अभिन्न अंग है.
मामला एक दो साल की बच्ची का था, जिसकी मां ने पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था. हालांकि, बच्ची के पिता के साथ चल रहे वैवाहिक विवाद और दर्ज प्राथमिकी के कारण, पासपोर्ट अधिकारियों ने मौखिक रूप से प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से मना कर दिया था. याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि पिता द्वारा सहमति न देना या माता-पिता के बीच के मुकदमों की वजह से बच्चे के अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए माना कि पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 6 के तहत केवल विशिष्ट आधारों (जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा या अदालती रोक) पर ही पासपोर्ट रोका जा सकता है.
