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‘क्या जन्म या वंश के आधार पर भगवान को छूने से रोकना संवैधानिक है’, सबरीमाला मामले में SC ने पूछा सवाल

सु्प्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सबरीमाला अयप्पा मंदिर के मुख्य पुजारी से पूछा कि क्या संविधान उस भक्त की मदद के लिए आगे नहीं आएगा जिसे देवता को छूने की इजाजत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी तब आई जब मुख्य पुजारी ने कहा कि कोई भक्त पूजा के लिए मंदिर जाता है, तो वह देवताओं की विशेषताओं के विपरीत नहीं हो सकता।

नौ जजों की संविधान पीठ धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिसमें केरल के सबरीमाला मंदिर का मामला भी शामिल है। साथ ही, पीठ कई धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और विस्तार पर भी सुनवाई कर रही है।

इस पीठ में चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस बीवी नागरत्ना, एमएल सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज महीस, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्य बागची शामिल हैं।

मंदिर में होने वाले समारोहों की प्रकृति धर्म का अभिन्न अंग- मुख्य पुजारी

मुख्य पुजारी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील वी गिरि ने दलील दी कि किसी मंदिर में होने वाले समारोहों और रीति-रिवाजों की प्रकृति उस धर्म का एक अभिन्न अंग होती है, और इसलिए उसे एक धार्मिक प्रथा माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रथा जारी रखना, जो एक अनिवार्य धार्मिक प्रथा है, पूजा के अधिकार का ही एक हिस्सा होगा। यह अधिकार उस धर्म या संप्रदाय में विश्वास रखने वाले हर सदस्य के लिए है।

गिरि ने कहा, “जब कोई भक्त पूजा के लिए मंदिर जाता है, तो वह देवता की विशेषताओं के विपरीत नहीं हो सकता, क्योंकि उसका उद्देश्य ही देवता की पूजा करना होता है। भक्त देवता में समाहित दिव्य आत्मा के प्रति पूरी तरह से समर्पित होता है। उसे देवता की मूल विशेषताओं को स्वीकार करना ही होता है।”

क्या संविधान मेरी मदद के लिए आगे नहीं आएगा- जस्टिस अमनुल्लाह

एक सवाल पूछते हुए जस्टिस अमनुल्लाह ने कहा, “जब मैं किसी मंदिर में जाता हूं, तो मेरा मूल विश्वास यह होता है कि वही भगवान हैं, वही मेरे रचयिता हैं, उन्होंने ही मुझे बनाया है—है ना? मैं वहां सौ प्रतिशत विश्वास के साथ जाता हूं।”

“मैं पूरी तरह से समर्पित होता हूं, मेरे दिल में किसी भी तरह की कोई अशुद्धि नहीं होती। और ऐसे में, मुझे यह कहा जाता है कि मेरे जन्म, मेरी वंश-परंपरा या किसी विशेष परिस्थिति के कारण, मुझे हमेशा के लिए देवता को छूने की इजाजत नहीं है। तो अब, क्या संविधान मेरी मदद के लिए आगे नहीं आएगा?”

रचयिता और उसकी रचना के बीच कोई अंतर नहीं हो सकता- जस्टिस अमनुल्लाह

जस्टिस अमनुल्लाह ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि रचयिता और उसकी रचना के बीच कोई अंतर नहीं हो सकता। गिरि ने जवाब दिया कि अगर किसी के पुजारी बनने पर पूरी तरह से रोक है, तो उसका समाधान या तो अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत कानून बनाकर किया जाएगा, या फिर राज्य खुद इसका समाधान करेगा।

उन्होंने कहा, “अगर पुजारी का मतलब वह व्यक्ति है जिसे ‘शास्त्रों’ में यह सिखाया गया हो कि पूजा कैसे करनी है और देवता की आराधना कैसे करनी है; और अगर किसी व्यक्ति के पुजारी बनने और फिर ‘सेवा’ करने पर, जैसा कि हम इसे कहते हैं, सिर्फ जन्म के आधार पर पूरी तरह से रोक लगा दी जाती है, तो इस समस्या का समाधान या तो अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत कानून बनाकर किया जाएगा, या फिर राज्य खुद इसका समाधान करेगा।”

नैष्ठिक ब्रह्मचारी को देवता की एक अनिवार्य विशेषता माना जा सकता है- मुख्य पुजारी

वरिष्ठ वकील ने कहा कि ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ (आजीवन ब्रह्मचारी) को देवता की एक अनिवार्य विशेषता माना जा सकता है, और सबरीमाला में किए जाने वाले अनुष्ठान और रस्में इसी अवधारणा के अनुरूप हैं। गिरि ने कहा, “संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मुझे अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है, अगर देवता की विशेषताएं ऐसी हैं कि मेरे लिए वहां जाना संभव नहीं है।

उदाहरण के लिए, अगर मैं एक महिला हूं, तो यह धर्म की विशेषताओं के अनुरूप ही होना चाहिए। जहां तक सबरीमाला का सवाल है, वहां देवता की विशेषता यह मानी जाती है कि देवता एक आजीवन ब्रह्मचारी हैं।”

उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं के पास ऐसा कोई ठोस सबूत या सामग्री नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ की जिस अवधारणा का जिक्र याचिकाकर्ताओं ने किया है, वह या तो बेबुनियाद है, या गलतफहमी पर आधारित है, या फिर वह धर्म का कोई अनिवार्य हिस्सा नहीं है।

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